प्रदेश में क्षेत्रवाद की राजनीति का अंत ।

उत्तराखंड देहरादून

उत्तराखंड की राजनीति में वर्तमान समय एक ऐतिहासिक बदलाव का साक्षी बन रहा है। दशकों से राज्य की प्रगति में बाधक रही ‘क्षेत्रवाद’ (गढ़वाल बनाम कुमाऊं) की संकीर्ण राजनीति अब धीरे-धीरे समाप्त हो रही है, और इसकी जगह ‘उत्तराखण्डीय अस्मिता’ और ‘एकीकृत विकास’ की भावना ले रही है। उत्तराखंड सरकार की विभिन्न नीतियों ने इस बदलाव को गति दी है।

 

 

यहाँ कुछ प्रमुख बिंदु हैं जो दर्शाते हैं कि कैसे उत्तराखंड क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर एक सशक्त प्रदेश बन रहा है:

1. कनेक्टिविटी ने मिटाई भौगोलिक दूरियां

पहले गढ़वाल और कुमाऊं के बीच दुर्गम रास्तों के कारण मानसिक दूरियां भी बनी रहती थीं। लेकिन अब ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, ऑल वेदर रोड और प्रस्तावित जमरानी बांध परियोजना जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स ने दोनों मंडलों को एक सूत्र में पिरो दिया है। जब आवाजाही सुगम होती है, तो सांस्कृतिक और व्यापारिक मेलजोल बढ़ता है, जो क्षेत्रवाद की जड़ों को कमजोर करता है।

2. युवाओं की बदलती सोच

आज का उत्तराखण्डी युवा सोशल मीडिया और आधुनिक शिक्षा के माध्यम से जुड़ा हुआ है। उनके लिए रोजगार, पलायन पर रोक और बेहतर शिक्षा प्राथमिकता है, न कि यह कि मुख्यमंत्री किस क्षेत्र से है। स्टार्टअप्स और होमस्टे जैसी योजनाओं ने युवाओं को पूरे प्रदेश को एक ‘इकोनॉमिक यूनिट’ के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया है।

 

 

3. समान विकास की नीति

सरकार द्वारा विकासात्मक योजनाओं का विकेंद्रीकरण किया गया है। अब बजट और परियोजनाओं का आवंटन क्षेत्रीय आधार पर न होकर ‘जरूरत’ के आधार पर हो रहा है। गैरसैंण (भराड़ीसैंण) को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करना इसी दिशा में एक बड़ा प्रतीकात्मक और रणनीतिक कदम था, जिसने दोनों मंडलों के बीच के असंतुलन को खत्म करने का प्रयास किया।

4. सांस्कृतिक एकीकरण

राज्य में आयोजित होने वाले महोत्सव, जैसे ‘इगास’ या ‘नंदा देवी राजजात’, अब किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गए हैं। पूरे प्रदेश के लोग इन्हें एक साथ मनाते हैं। ‘पहाड़ी’ होने का गर्व अब गढ़वाली या कुमाऊँनी होने की पहचान से कहीं बड़ा हो गया है।

 

 

5. राजनीति का नया स्वरूप

राजनीतिक दलों ने भी अब महसूस कर लिया है कि जनता केवल क्षेत्रीय कार्ड खेलने से प्रभावित नहीं होने वाली। अब चुनावी विमर्श ‘भ्रष्टाचार मुक्त शासन’ और ‘अंतिम छोर तक विकास’ पर केंद्रित हो गया है। मुख्यमंत्री कार्यालय के माध्यम से जन-शिकायतों का त्वरित निवारण अब बिना किसी क्षेत्रीय भेदभाव के किया जा रहा है।

 

 

 

क्षेत्रवाद का अंत उत्तराखंड के स्वर्णिम भविष्य की पहली शर्त है। जब हम ‘गढ़वाल’ और ‘कुमाऊं’ के चश्मे को उतारकर एक ‘उत्तराखण्डी’ के रूप में सोचना शुरू करते हैं, तभी सही मायने में राज्य निर्माण का उद्देश्य सफल होता है। आज का उत्तराखंड इसी गौरवशाली मार्ग पर अग्रसर है।